अध्याय 5 BASIC FACTS OF THE PRAYER (प्रार्थना के तथ्य)

 अध्याय 5
BASIC FACTS OF THE PRAYER
प्रार्थना के तथ्य


प्रस्तावना:

हमने पिछले अध्याय में मनन किया की प्रार्थना के मूल तत्व (Basic elements) क्या है और हमने यह भी मनन किया था कि आप अपने प्रार्थना करने के तरीके को न बदलें वरन यह पाठ्यक्रम आपके मसीही जीवन में आत्मिक उन्नति को बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। आपका प्रार्थना का जीवन आपका संबंध परमेश्वर के साथ मजबूत करता है इस अध्याय में हम प्रार्थना के तथ्यों पर मनन करेंगे जो हमें सिखाएंगे कि हमारी प्रार्थना परमेश्वर कब सुनते हैं और कब पूरा करते हैं। यह तथ्य पवित्र शास्त्र बाइबल के हैं जिन्हें न सिर्फ हमें पता होना चाहिए परंतु इन बातों को हमें प्रतिदिन अपने जीवन में अमल करना चाहिए। यह सच है कि एक मसीही जीवन प्रार्थना का जीवन है पर हमारा प्रार्थना का वक्त हमारे अनंत जीवन में परमेश्वर के साथ रहने में बहुत सहायता करेगा। पृथ्वी पर जितना वक्त मनुष्य परमेश्वर के बिना व्यतीत करता है उतना ही परमेश्वर के बिना अनंत जीवन में वक्त बिताना पड़ेगा। यह एक कड़वा सच है। प्रार्थना के जीवन में हमें कुछ खास विशेष बातों का ख्याल रखना पड़ता है हमारी प्रार्थनाएं जरूर सुनी जाती हैं। कोई व्यक्ति बिना विश्वास की प्रार्थना कर रहा है तब भी उसकी प्रार्थना परमेश्वर सुनते हैं। जब इस्रायल मिस्र के बंधन में था तो परमेश्वर ने उनकी यातना, आहों और पीड़ा को बिना कहे सुन लिया। जब वो बंधुवाई से वापस आ गए तब जंगल में परमेश्वर ने उनकी बुड़बुड़ाने व कुड़कुड़ाने की आवाज को सुन लिया। लाज़र की कब्र पर यीशु कहते हैं हे पिता तू हमेशा मेरी प्रार्थना को "सुनता है" वह पूरा करता है। यीशु मन की बात तक को सुन लेते थे। प्रभु यीशु मसीह ने दुष्ट आत्माओं की विनती को सुन लिया। दुष्ट आत्माओं ने प्रभु यीशु मसीह को पहचान लिया और कहा तू परमेश्वर का पुत्र मसीह है हमें समय से पहले नष्ट करने क्यों आ गया हमें अतह कुंड में न डाल वरन सूअरों के झुंड में भेज दे और यीशु ने उनकी प्रार्थना को सुना और पूरा भी किया। तो जरा सोचिए परमेश्वर आपकी प्रार्थना को भी जरूर सुनते हैं।


बाइबिल में हम देखते हैं परमेश्वर के लोगों की प्रार्थनाएं सुनकर भी पूरी नहीं हुईं। एक बार राजा दाऊद का पुत्र मरने पर था और वह बीमार पड़ा था राजा ने खाना पीना छोड़ दिया था और अपने बेटे की जान बचाने के लिए वह निरंतर प्रार्थना करता रहा परंतु परमेश्वर ने उसकी प्रार्थना को नहीं सुना। शाऊल ने परमेश्वर की आज्ञा को तोड़ा परमेश्वर ने उसकी प्रार्थनाओं को पूरा नहीं किया। कनानी स्त्री अपनी बेटी के लिए विनती कर रही थी और उसकी विनती को प्रभु यीशु मसीह नजरअंदाज कर रहे थे क्योंकि वो उसका विश्वास देखना चाहते थे। प्रार्थना नहीं सुनी जाती इसके कई वजहें होती हैं। प्रार्थना का सुना जाना और उसके पूरे होने में अंतर है। प्रार्थना हमेशा सुनी जाती है और उत्तर भी लेकर आती है। प्रार्थना का उत्तर तीन बातों में आता है। हां (Yes)/ न (No)/ प्रतीक्षा करो (Wait)। God Answer our prayers in "Yes" "No" "Wait" जब आप प्रार्थना करते हैं तो उसका उत्तर हां में परमेश्वर देते हैं यानी परमेश्वर इस बात पर राज़ी होते हैं कि आपने जो मांगा है उसमें उनकी मर्जी पूरी हो रही है उसमें आपकी व दूसरों की भलाई छुपी हुई है। "और हमें उसके साम्हने जो हियाव होता है, वह यह है; कि यदि हम उस की इच्छा के अनुसार कुछ मांगते हैं, तो हमारी सुनता है। "1 यूहन्ना 5:14

उसमें परमेश्वर की बहुत सी योजनाएं और समीकरण होते हैं जिन्हें हम अपनी छोटी व सीमित समझ से नहीं समझ सकते। इसी तरीके से बहुत बार प्रार्थना का उत्तर नहीं आता क्योंकि वह बात परमेश्वर की इच्छा में नहीं होती न ही उसमें आपकी भलाई है और न किसी और की। बहुत सी बार मन की शंका और शक प्रार्थना के उत्तर नहीं लाती। कभी-कभी अच्छा होता है कि हमारी प्रार्थनाओं का उत्तर नहीं में मिले। प्रार्थना का न सुना जाना कभी कभी धन्यवाद का विषय होता है। उसमें परमेश्वर को दोष न दें न ही उसके सामने प्रश्न खड़े करें। बाइबल बताती है क्या मिट्टी अपने बनाने वाले से प्रश्न कर सकती हैं? उसने हमें अपने हाथों से रचा है और जिसने हमें रचा है वह हमारी जरूरतों और आवश्यकताओं को पहले से जानता है।

बाइबिल में एक राजा हुआ जिसका नाम हिज्जिकिया था जो इस्रायलिओं का राजा था। एक बार वह बहुत बीमार पड़ा। परमेश्वर की इच्छा यह थी कि परमेश्वर उसे अपने पास बुला ले पर उसने रो-रोकर परमेश्वर की इच्छा को बदल दिया और परमेश्वर ने उसकी आयु में 15 वर्ष जोड़ दिए और बाइबल बताती है, जब उसने परमेश्वर की इच्छा को बदला तब उसकी प्रजा व कौम का बहुत भारी नुकसान हुआ न केवल इस्रायल कौम का परंतु उसके परिवार का भी और उन्हें पूरी प्रजा समेत बहुत दुख उठाना पड़ा। इसलिए परमेश्वर की इच्छा सही समय पर पूरी होना बहुत जरूरी है उस इच्छा को हमें स्वीकार करना चाहिए और अगर हमारी प्रार्थनाएं नहीं सुनी जाती तो परमेश्वर की इच्छा को स्वीकार करके हमें अपने जीवन में अपनाना चाहिए इसमें हम सबकी भलाई होती है। "कभी-कभी दुआ का सिर्फ सुना जाना उसके पूरे न होने से बेहतर है।"

कभी-कभी लोग परमेश्वर से वायदे करते हैं और उसके सामने परिस्थितियां रखते हैं। कि अगर परमेश्वर ऐसा करेगा तो हम ऐसा करेंगे बस हमारी यह प्रार्थना सुन ले और यह काम कर दे। और फिर उस वायदे को पूरा करने में देरी लगाते हैं। कभी-कभी तो प्रार्थना के पूरा होने पर किए गए वादों को पूरा ही नहीं करते। और ऐसा करके वो अपने आपको अपने ही दिए गए वचनों में फंसा लेते हैं। उससे होता यह है कि परमेश्वर की नाराजगी उनके काम नहीं बनने देती या उनके काम शुरू होने से पहले ही खत्म हो जाते हैं। बाइबल बताती है दुनिया का सर्वश्रेष्ठ बुद्धिमान उपदेशक कहता है। "बातें करने में उतावली न करना, और न अपने मन से कोई बात उतावली से परमेश्वर के सामने निकालना, क्योंकि परमेश्वर स्वर्ग में हैं और तू पृथ्वी पर है; इसलिये तेरे वचन थोड़े ही हों॥" "जब तू परमेश्वर के लिये मन्नत माने, तब उसके पूरा करने में विलम्ब न करना; जो मन्नत तू ने मानी हो उसे पूरी करना।" मन्नत मान कर पूरी न करने से मन्नत का न मानना ही अच्छा है। कोई वचन कहकर अपने को पाप में ने फंसाना, और न ईश्वर के दूत के सामने कहना कि यह भूल से हुआ; परमेश्वर क्यों तेरा बोल सुन कर अप्रसन्न हो, और तेरे हाथ के कार्यों को नष्ट करे?" सभोपदेशक 5: 2,4-6

प्रिय नए विश्वासी आप प्रार्थना के सफर में मसीही जीवन में आगे बढ़ रहे हैं मजबूत हो रहे हैं एक ऐसा दरख़्त बनने जा रहे हैं जिसे फलवंत होना है जो कलीसिया का मजबूत स्तंभ होगा। हम मसीही जीवन के सफर में धीरे-धीरे आगे बढ़ते हैं किसी भी बात में जल्दबाजी न करें वरन बातों को समझकर सीखें। परमेश्वर मेरी, आपकी और परिपक्व मसीही कलीसियाओं की सहायता करते हैं कोई भी कामिल (perfect) नहीं सब में कुछ न कुछ कमियां होती हैं और उन कमियों में परमेश्वर हमारी पूरी पूरी सहायता करते हैं यह एक खुशखबरी है।

BASIC FACTS OF THE PRAYER (प्रार्थना के अटूट तथ्य)

1. PRAY IN JESUS NAME- यीशु मसीह के नाम से प्रार्थना:

जब आप प्रार्थना करें तो यह हमेशा ध्यान रखें कि प्रभु यीशु मसीह परमेश्वर हैं। हां वो परमेश्वर के पुत्र हैं पर वह परमेश्वर हैं। क्योंकि पिता के सारे गुण पुत्र में होते हैं।प्रार्थना में आप परमेश्वर से बात करते हैं आप प्रार्थना में परमेश्वर से वह मांगते हैं जिसे आपको लगता है कि उसे पाना बहुत मुश्किल है और परमेश्वर ही उसको पूरा कर सकते हैं। पर आपकी प्रार्थना इस बात पर निर्भर करती है कि आप किस से मांग रहे हैं। क्योंकि संसार में एक ईश्वर और है। बाइबल बताती है "अब इस जगत का न्याय होता है, अब इस जगत का सरदार निकाल दिया जाएगा।" यूहन्ना 12:31 हम जानते हैं, कि हम परमेश्वर से हैं, और सारा संसार उस दुष्ट के वश में पड़ा है। 1 यूहन्ना 5:19 "और उन अविश्वासियों के लिये, जिन की बुद्धि को इस संसार के ईश्वर ने अन्धी कर दी है, ताकि मसीह जो परमेश्वर का प्रतिरूप है, उसके तेजोमय सुसमाचार का प्रकाश उन पर न चमके।" 2 कुरिन्थियों 4:4


हम परमेश्वर को ही सर्वव्यापी जीवन दाता इस कायनात को चलाने वाला मानकर विश्वास करते हैं और बाइबिल बताती है कि एक स्वर्गदूत है जो परमेश्वर को परमेश्वर न स्वीकार करके अपने को ही परमेश्वर मानता है। वह इब्लीस है शैतान है जिसने यीशु को बाध्य किया कि वो उस से प्रार्थना करें और कहें कि वह उन्हें संसार की धन-दौलत और राजसत्ता सोपे। और उसके आगे दंडवत करके उसे प्रणाम करें। प्रभु यीशु ने कहा "है शैतान दूर हो क्योंकि लिखा है "कि तू अपने परमेश्वर की उपासना कर और उसी को दंडवत कर।"

ध्यान रहे बाइबल में लिखा है "क्योंकि हमारा यह मल्लयुद्ध, लहू और मांस से नहीं, परन्तु प्रधानों से और अधिकारियों से, और इस संसार के अन्धकार के हाकिमों से, और उस दुष्टता की आत्मिक सेनाओं से है जो आकाश में हैं।" इफिसियों 6:12 

प्रार्थना में हमारे शब्द मायने रखते हैं।  हमें प्रार्थना परमेश्वर से करनी है और प्रभु यीशु मसीह के नाम से मांगनी है। बाइबल में प्रभु का दास हुआ है जिसका नाम दैनियल था उसकी प्रार्थना को किसी ने 21 दिन तक रोक कर रखा आइए देखें। यह बात डेनियल को अपने एक दर्शन में पता चली कि उसकी प्रार्थना को 21 दिन तक शैतान ने रोक कर रखा। "फारस के राज्य का प्रधान इक्कीस दिन तक मेरा साम्हना किए रहा; परन्तु मीकाएल जो मुख्य प्रधानों में से है, वह मेरी सहायता के लिये आया, इसलिये मैं फारस के राजाओं के पास रहा।" दानिय्येल 10:13 

यह बात बड़ी गंभीर है कि आप किस से प्रार्थना कर रहे हैं किसके द्वारा प्रार्थना मांग रहे हैं यीशु कहते हैं- यदि तुम मुझ से मेरे नाम से कुछ मांगोगे, तो मैं उसे करूंगा। यूहन्ना 14:14 प्रभु यीशु मसीह का वादा है कि हम उसके नाम से अगर मांगेंगे तो वह उस बात को जरूर पूरा करेगा। संसार का ईश्वर भी अपने अनुयायियों की प्रार्थना सुनकर पूरा करता है और जो प्रार्थना यीशु के नाम से नहीं की जाती वह उन्हें पकड़ लेता है। यह गलती नहीं है हम मसीह जीवन में प्रार्थनामय जीवन में गिर गिर कर चलना व संभलना सीखते हैं जब आप प्रार्थना करें तो यीशु के नाम से परमेश्वर से मांगे।

2. BY FAITH- विश्वास के द्वारा:

प्रिय नये विश्वासी बिना विश्वास प्रार्थना करना हवा में शब्दों को छोड़ना है। विश्वास मसीही जीवन की वह आस्था है जिसके द्वारा हमारी प्रार्थनाओं के उत्तर मिलते हैं। बिना परमेश्वर पर विश्वास किए बिना हमारी प्रार्थनाएं सिर्फ सुनी जाती हैं उनका उत्तर नहीं मिलता। जब प्रभु यीशु मसीह ने 70 चेलों को राज्य स्थापना के लिए भेजा यानी लोगों को यह बताने के लिए कि इस जीवन के बाद एक और जीवन है जो हमें परमेश्वर के साथ बिताना है उनका जीवन बचाने के लिए उनको चंगाई देने के लिए उनके जीवन में से अंधकार दूर करने के लिए बीमारियां और पीड़ाओं को यीशु के नाम से खत्म करना ही राज्य की स्थापना है। तब चेलों ने वापस आकर कहा "गुरु तेरे नाम से बीमारियां और दुष्ट आत्मा भी हमारे वश में है।" मतलब यीशु के नाम से उन्होंने जो प्रार्थना कि उससे उन्होंने सामर्थ के काम किए। 

यहां पर आप ध्यान दें सबसे पहली बात यहां 70 चेलों को यीशु ने अपनी बुलाहट यानी (calling) (परमेश्वर के काम के लिए बुलाया जाना) दी‌ व आज्ञा दी तब समर्थ के काम हुए। दूसरी बात यहां पर चेलों की इच्छा से नहीं पर परमेश्वर की इच्छा में काम हो रहे हैं। चेले इस वृतांत के बाद आत्मविश्वास से भर गए और लोगों को यह लगा चेले भी यीशु की तरह सामर्थ के काम करते हैं।

इस घटना के बाद एक व्यक्ति चेलों के पास आया और अपने लड़के की चंगाई के लिए विनती करने लगा। चेलों ने सारे दिन उस गूंगी बहरी दुष्ट आत्मा को निकालने में अपना समय अपनी ऊर्जा लगाई पर कुछ हासिल न हुआ। (मत्ती 17:19ऐसा क्यों हुआ जबकि यही चले यीशु के भेजने पर चंगाईयां दे रहे थे दुष्ट आत्माएं निकाल रहे थे सामर्थ के काम कर रहे थे पर यहां पर यह गूंगी बहरी दुष्ट आत्मा को न निकाल सके। जी हां अगर आप प्रेरितों के काम की पुस्तक में पढ़ें तो वहां पर लिखा है मात्र चेलों की परछाई पड़ने से लोग चंगे हो जाते थे। पर यहां पर चेले इस गूंगी बहरी दुष्ट आत्मा को निकालने में नाकामयाब रहे।

आप इस बात को जरूर ध्यान दें कि परमेश्वर का अगर कोई कार्य किसी के जीवन में होता है तो वह परमेश्वर की इच्छा के बिना नहीं हो सकता। अब आप उस व्यक्ति पर ध्यान करें जो यीशु के पास न जाकर चेलों के पास पहुंच गया। हम कभी-कभी परमेश्वर से विश्वास हटाकर अपना विश्वास मनुष्यों पर लगा देते हैं कि यह हमारे जीवन में प्रभु का काम करेगा। बाइबल बताती है "शापित है वह मनुष्य जो मनुष्य पर भरोसा रखता है; और आशीषित है वह जो परमेश्वर पर अपना भरोसा रखता है।" ध्यान रहे विश्वास किस पर करना है यह बहुत ज्यादा मायने रखता है वरना इस संसार में लोग बहुत बातों पर विश्वास करते हैं और उनका ईश्वर उन्हें सब देता है, पर यह गारंटी नहीं होती कि उन आशीशों में सुख और चैन मिला है या नहीं। हां यह सच है कि 70 चेलों ने दुष्ट आत्माएं निकाली सामर्थ के काम किए क्योंकि प्रभु यीशु मसीह ने उन्हें आज्ञा दी थी और उस आज्ञा में परमेश्वर की इच्छा थी इसलिए उन्होंने यह सब काम किए। यहां पर यह व्यक्ति मनुष्य पर भरोसा रख कर चंगाई लेने आया है तो न तो चेलों को कुछ हासिल हुआ और न उस व्यक्ति को और न उस लड़के को। चेलों में आत्मविश्वास भरा हुआ था पर विश्वास की कमी थी। बाद में चलो ने पूछा गुरु हम इस दुष्ट आत्मा को क्यों न निकाल सके चलों के पूछे जाने पर प्रभु यीशु मसीह ने कहा यह तुम्हारे विश्वास की धटी के कारण से हुआ।


इस जगह पर चेलों का अभी समय नहीं आया और वह बिना परमेश्वर की बुलाहट और आज्ञा के इस काम को करने में अपने हाथ लगा रहे थे। मैं आपको ध्यान दिलाना चाहता हूं स्वर्गारोहण के वक्त यीशु ने चेलों से कहा था अभी ठहरे रहना तुरंत काम शुरू न करना उस प्रतिज्ञा का इंतजार करना जब पवित्र आत्मा तुम पर उतरेगा तब तुम समर्थ पाओगे और सारे जगत में मेरे नाम के गवाह बनोगे। "ओर उन से मिलकर उन्हें आज्ञा दी, कि यरूशलेम को न छोड़ो, परन्तु पिता की उस प्रतिज्ञा के पूरे होने की बाट जोहते रहो, जिस की चर्चा तुम मुझ से सुन चुके हो।" प्रेरितों के काम 1:4 हमारी प्रार्थना में पवित्र आत्मा हमारी सहायता करते हैं हमारा विश्वास इंसान पर नहीं परमेश्वर पर होना जरूरी है। "प्रार्थना के बिना विश्वास अधूरा है और प्रार्थना के बिना विश्वास में कुछ मांगना बाइबल की शिक्षा नहीं।"

ध्यान रहे विश्वास को लेकर बहुत से ज्ञान है पर हर ज्ञान मसीही जीवन के लिए नहीं है संसार की शिक्षाएं प्रार्थना की नकल कर सकती हैं पर प्रार्थना अपने आप में ही एक जबरदस्त मसीही जीवन का आत्मिक शस्त्र है। जिससे आज भी और इतिहास में भी बड़े-बड़े युद्ध जीते गए। प्रार्थना परमेश्वर से प्रभु यीशु मसीह के नाम से करना है यह बाइबल की सही शिक्षा है। बाइबल बताती है प्रभु यीशु मसीह ने चेलों को सिखाया कि उन्हें प्रार्थना करना है पर पूरे विश्वास के साथ कि जो मांगा है वह परमेश्वर से समझो उन्हें मिल गया उस बात पर वह प्रतिति कर लें और वो उनके लिए हो जाएगा।और जो कुछ तुम प्रार्थना में विश्वास से मांगोगे वह सब तुम को मिलेगा॥ मत्ती 21:22

प्रार्थना और विश्वास के एक साथ मेल को प्रभु यीशु मसीह ने बाइबिल में सिखाया। और अंजीर का एक पेड़ सड़क के किनारे देखकर वह उसके पास गया, और पत्तों को छोड़ उस में और कुछ न पाकर उस से कहा, अब से तुझ में फिर कभी फल न लगे; और अंजीर का पेड़ तुरन्त सुख गया। मत्ती 21:19 यह देखकर चेलों ने अचम्भा किया, और कहा, यह अंजीर का पेड़ क्योंकर तुरन्त सूख गया? मत्ती 21:20 यीशु ने उन को उत्तर दिया, कि मैं तुम से सच कहता हूं; यदि तुम विश्वास रखो, और सन्देह न करो; तो न केवल यह करोगे, जो इस अंजीर के पेड़ से किया गया है; परन्तु यदि इस पहाड़ से भी कहोगे, कि उखड़ जा; और समुद्र में जा पड़, तो यह हो जाएगा। मत्ती 21:21 प्रिय मसीही विश्वासी मैं एक पासबान हूं। मेरे पास कई ऐसे विश्वासी लोग आते हैं जो अपनी गवाही सुनाते हैं और कहते हैं परमेश्वर ने उनके जीवन में प्रार्थना को सुनकर उत्तर दिया है। परमेश्वर पर विश्वास ही परमेश्वर से जो मांगा गया है वह जरूर पूरा होगा उस प्रार्थना को परमेश्वर जरूर सुनते हैं और पूरा करते हैं।

3. BY HUMILITY- नम्रता के साथ प्रार्थना:

प्रिय नए विश्वासी मैं जानता हूं आपने पुराना जीवन त्याग कर नए जीवन में प्रवेश किया है। और यह नम्रता के बिना आप नहीं कर पाते क्योंकि पत्थर मन और घमंड दोनों ही अविश्वास की पक्की नींव है। आप नम्र हैं आप दीन है प्रभु की महिमा हो ✝️


बाइबल बताती है दीन होकर प्रार्थना करना परमेश्वर को भाता है मन की कोमलता व नम्रता सहित प्रार्थना उत्तर लेकर आती है। राजा सुलेमान के वक्त में उद्धारकर्ता प्रभु यीशु मसीह इस पृथ्वी पर अभी नहीं पहुंचे थे। और बाइबिल बताती है प्रभु यीशु मसीह के नाम के बिना प्रार्थना पूरी नहीं होती। तो फिर परमेश्वर  अपनी प्रजा, सुलेमान, दाऊद, डेनियल जैसे लोगों की प्रार्थनाओं के उत्तर क्यों देते थे? क्योंकि वे परमेश्वर के चुने भक्त व दास थे। और परमेश्वर अपने उन्हीं दासों और भक्तों को चुनते हैं जो दीन और नम्र होना जानते हैं।  जो खास बात परमेश्वर को प्रार्थना में पसंद आती है वह यह है कि एक विश्वासी और पापी का टूटा हुआ मन जिसमें दीनता और नम्रता होती है और यही बात परमेश्वर ने सुलेमान से कही। "तब यदि मेरी प्रजा के लोग जो मेरे कहलाते हैं, दीन हो कर प्रार्थना करें और मेरे दर्शन के खोजी हो कर अपनी बुरी चाल से फिरें, तो मैं स्वर्ग में से सुन कर उनका पाप क्षमा करूंगा और उनके देश को ज्यों का त्यों कर दूंगा।2 इतिहास 7:14 "यहोवा की यह वाणी है, ये सब वस्तुएं मेरे ही हाथ की बनाई हुई हैं, सो ये सब मेरी ही हैं। परन्तु मैं उसी की ओर दृष्टि करूंगा जो दीन और खेदित मन का हो, और मेरा वचन सुनकर थरथराता हो॥ "यशायाह 66:2

संसार दीन और नम्र जीवन को कमज़ोर मानता है पर बाइबल बताती है कि दीन और नम्र जीवन इस पृथ्वी का सबसे सामर्थ्य जीवन होता है क्योंकि एक दीन और नम्र जन की प्रार्थना को परमेश्वर तुरंत सुनकर तुरंत उत्तर देते हैं। दुनिया के मशहूर पासबान रिक वारिन कहते हैं humble people are the most powerful people of the planet. नम्र लोग दुनिया के सबसे ताकतवर लोग होते हैं। "धन्य हैं वे, जो नम्र हैं, क्योंकि वे पृथ्वी के अधिकारी होंगे।"त्ती 5:5 धन्य हैं वे, जो मन के दीन हैं, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है। मत्ती 5:3

4. PRAY IN SPIRIT- आत्मा में प्रार्थना:

प्रिय नए विश्वासी आप मन में प्रार्थना कर सकते हैं पर मुख से शब्दों का उच्चारण करना भी जरूरी है। बाइबल बताती है कि उद्धार के लिए प्रार्थना में मन से विश्वास करना और मुख से वचनों को बोलना जरूरी है। "कि यदि तू अपने मुंह से यीशु को प्रभु जानकर अंगीकार करे और अपने मन से विश्वास करे, कि परमेश्वर ने उसे मरे हुओं में से जिलाया, तो तू निश्चय उद्धार पाएगा। क्योंकि धामिर्कता के लिये मन से विश्वास किया जाता है, और उद्धार के लिये मुंह से अंगीकार किया जाता है। क्योंकि जो कोई प्रभु का नाम लेगा, वह उद्धार पाएगा।" रोमियो 10:9-13 इसलिए आप प्रार्थना को मन में कर सकते हैं पर अगर बोलकर प्रार्थना करते हैं तो उससे भी ज्यादा अच्छा है। प्रभु का दास पौलुस कहता है कि प्रार्थना को आत्मा में करो। वो कहता है "हर समय और हर प्रकार से आत्मा में प्रार्थना, और बिनती करते रहो, और इसीलिये जागते रहो, कि सब पवित्र लोगों के लिये लगातार बिनती किया करो।" इफिसियों 6:18


आत्मा में प्रार्थना हम धीरे-धीरे सीखते हैं जब आप प्रार्थना की आदत को अपने भीतर बनाएंगे तब परमेश्वर का आत्मा आपकी आत्मा के साथ मिलकर आहें भर भर कर प्रार्थना करता है और वही हमें सिखाता है कि हम प्रार्थना में क्या बोलें और क्या कहें। इसी रीति से आत्मा भी हमारी दुर्बलता में सहायता करता है, क्योंकि हम नहीं जानते, कि प्रार्थना किस रीति से करना चाहिए; परन्तु आत्मा आप ही ऐसी आहें भर भरकर जो बयान से बाहर है, हमारे लिये बिनती करता है। रोमियो 8:26

5. With Oneness with one mind soul and spirit- (एक मन होकर प्रार्थना):

परमेश्वर के वचन का हमारे हृदय में बसना इस बात को प्रमाणित करता है कि परमेश्वर हमारे अंदर है। अगर परमेश्वर का वचन हमारे अंदर नहीं तो हम परमेश्वर से दूर हैं और हम परमेश्वर में नहीं हैं। जबकि हम सबको इस बात को समझना पड़ेगा कि जब हम परमेश्वर में होते हैं और परमेश्वर का वचन हम में होता है तब हमारी प्रार्थनाओं को सुना जाता हैं। यीशु कहते हैं "यदि तुम मुझ में बने रहो, और मेरी बातें तुम में बनी रहें तो जो चाहो मांगो और वह तुम्हारे लिये हो जाएगा।" यूहन्ना 15:7 प्रिय नए विश्वासी बाइबल प्रार्थना के विषय शिक्षा देती है कि एक मन से की गई प्रार्थना परमेश्वर के द्वारा उत्तर लेकर आती है।  एक बार पृथ्वी पर बाबुल के लोगों ने यह फैसला किया कि स्वर्ग तक ऊंचा गुंबद बनाएंगे। उत्पत्ति (Genesis 11:1-9) बाइबल बताती है और उस गलत काम में सब एक मन और एक मनशा रखे हुए उन्होंने काम करना शुरू कर दिया। जब मनुष्य ने एक मन एक सोच के साथ काम शुरू किया तो परमेश्वर बेचैन हो उठे। लिखा है बाइबिल में परमेश्वर खुद उतर के आए और उन्होंने उनकी भाषा में गड़बड़ी डाल दी और उस काम को रोक दिया। कहने का मतलब है जब हम एक मन एक मनशा से प्रार्थना करते हैं तब हमारी प्रार्थनाओं को परमेश्वर बहुत जल्द सुनते हैं।


बाइबल बताती है जब पतरस बंदीगृह में बंद था तो पूरी कलीसिया लौ लगा कर एक मन हो कर प्रार्थना कर रही थी। फिर आगे लिखा है कलीसिया की एक मन की प्रार्थना ने परमेश्वर को एक स्वर्गदूत उतारने पर विवश कर दिया और उस स्वर्गदूत ने जंजीरों में जकड़े पतरस को छुड़ा लिया। प्रभु यीशु मसीह इस बात को सिखाते थे और आज भी सिखाते हैं- 

"फिर मैं तुम से कहता हूं, यदि तुम में से दो जन पृथ्वी पर किसी बात के लिये जिसे वे मांगें, एक मन के हों, तो वह मेरे पिता की ओर से स्वर्ग में है उन के लिये हो जाएगी।" मत्ती 18:19

उपसंहार:

प्रिय नए विश्वासी आप की प्रार्थना आपके और परमेश्वर के बीच में एक गहरा संबंध बनाती है। और इन तथ्यों का मकसद सिर्फ आपको आपके प्रार्थनामय जीवन में अधिकाई से मजबूत करना है। ध्यान रखें आपकी अपनी प्रार्थना की जो आदत है उस को बदलने की कोशिश न करें आप प्रार्थना जैसे करते आए हैं वैसी करते रहें परंतु परमेश्वर के वचन में से इन कुछ खास बातों को अपनी प्रार्थना में सिर्फ ध्यान रखें। मेरा विश्वास है यह बातें परमेश्वर के वचन से हम सबके जीवन में मनन करने योग्य हैं और हमारे प्रार्थना के जीवन को और अधिकाई से गहरी नींव पर बनाने के लिए सहायक सिद्ध होंगी।

"किसी भी बात की चिन्ता मत करो: परन्तु हर एक बात में तुम्हारे निवेदन, प्रार्थना और बिनती के द्वारा धन्यवाद के साथ परमेश्वर के सम्मुख अपस्थित किए जाएं।" फिलिप्पियों 4:6

मसीही जीवन प्रार्थना का जीवन है "इसलिए जागते रहो, और प्रार्थना करते रहो, कि तुम परीक्षा में न पड़ो।" मत्ती  26:41


-PASTOR VIVEK SIMON -




















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