अध्याय -4 प्रार्थना के मूल तत्व

 अध्याय -4
प्रार्थना के मूल तत्व

Basic Elements of Prayer

प्रस्तावना-

जब आपने प्रभु यीशु मसीह को स्वीकार किया होगा आपको बताया गया होगा कि हम प्रार्थना करते हैं। प्रार्थना हम सबके आत्मिक जीवन में एक विशेष स्थान रखती है। आइए प्रार्थना को अब हम विस्तार से अध्ययन करेंगे जो एक दिलचस्प और महत्वपूर्ण विषय है। कोई भी व्यक्ति जन्म से प्रार्थना करने नहीं लगता पर यह परमेश्वर की इच्छा पर निर्भर करता है कि वह व्यक्ति परमेश्वर की नजदीकी में प्रभु येशु मसीह के नाम से आए और जब वह अविश्वासी सच्चे परमेश्वर को अपने बनाने वाले को पहचान जाता है तब खुद पवित्र आत्मा घुटनों पर उसे ले जाकर उसे प्रार्थना सिखाते हैं।

जो आपका प्रार्थना करने का तरीका है आप उसे न बदलें इस पाठ्यक्रम के इस विशेष अध्याय का मकसद आपके प्रार्थना में जीवन को और अधिक मजबूत वह प्रभावशाली बनाना है। इस पाठ्यक्रम के द्वारा इस विशेष अध्याय के माध्यम से आप अपनी प्रार्थना में कुछ खास बातें जोड़कर एक प्रभावशाली प्रार्थना कर पाएंगे। प्रार्थनामय जीवन के कुछ मूल तत्व हैं जो परमेश्वर के वचन से ही हैं, हम मनन करेंगे। "दुआ" "प्रार्थना" मात्र एक छोटा सा शब्द है पर उतना ही प्रभावशाली है। प्रभावशाली प्रार्थना करना एक दिन का काम नहीं परंतु यह प्रतिदिन की वर्जिश है, इसमें हम प्रतिदिन बढ़ते जाते हैं वह निपुण होते जाते हैं। आप इस संसार में जितनी भी प्रभु यीशु मसीह की सेवा करने वाली संस्थाएं मिनिस्टरी या प्रभु के सेवक देखते हैं वह सब प्रार्थना का ही नतीजा है।

       

                                       

क्योंकि हम प्रार्थना के द्वारा से जान पाते हैं कि परमेश्वर की इच्छा क्या है। प्रार्थना को हम अपने मन से उठने वाले भावों को शब्दों के द्वारा प्रकट करते हैं और वह शब्द जो हमारे होठों और आत्मा से प्रकट होते हैं वही प्रार्थना कहलाते हैं। बाइबल बताती है निरंतर प्रार्थना मैं लगे रहो। क्योंकि प्रार्थना एक विश्वासी की आत्मिक सांसे हैं। 1 Thessalonians 5:17

What shall I say in prayer: Basic Elements of Prayer-

मैं प्रार्थना में क्या कहूं: प्रार्थना के मूल तत्व-

1. Praise God: परमेश्वर की प्रशंसा करें-

प्रिय नए विश्वासी क्या आप जानते हैं की प्रार्थना वह खूबसूरत समय है जिसमें हम परमेश्वर के साथ अपना वक्त व्यतीत करते हैं और अपना संबंध उसके साथ मजबूत बनाते हैं। प्रार्थना हर वक्त सिर्फ मांगने का माध्यम नहीं है। प्रार्थना परमेश्वर की तारीफ और उसकी जय जयकार करना है। परमेश्वर अपनी बनाई सृष्टि से अपनी अपार स्तुति कराते हैं बाइबल बताती है "आकाश ईश्वर की महिमा वर्णन कर रहा है; और आकशमण्डल उसकी हस्तकला को प्रगट कर रहा है। दिन से दिन बातें करता है, और रात को रात ज्ञान सिखाती है। न तो कोई बोली है और न कोई भाषा जहां उनका शब्द सुनाई नहीं देता है। उनका स्वर सारी पृथ्वी पर गूंज गया है, और उनके वचन जगत की छोर तक पहुंच गए हैं। उन में उसने सूर्य के लिये एक मण्डप खड़ा किया है।" भजन संहिता 19:1-4

सृष्टि अपने सृर्जनहार से कुछ नहीं मागंती क्योंकि उसे पता है कि कल का दिन उन्हें अपना भोजन जरूर देगा। बस वह चहचहा कर गला खोलकर अपने गीत गाकर परमेश्वर की स्तुति और महिमा करते हैं। चाहे सृष्टि के जीव हों या निर्जीव वे सब परमेश्वर की आराधना करते हैं।

बाइबल एक कठोर दुष्ट राजा के विषय बताती है जिसने इस्राइल को बंधुवा बना लिया था और पूरे संसार पर अपनी हुकूमत और ताकत चाहता था अपने को वह खुदा समझता था पर जब परमेश्वर ने उसकी मनशा और घमंड को देखा तो अपने को उस पर प्रकट किया और उसके घमंड व कठोर हृदय को तोड़ कर उसे अपने घुटनों पर टिका दिया। उस राजा का जिक्र आपको बाइबल के पुराने नियम की पुस्तक डेनियल में मिलेगा। उस राजा का नाम नबुकदनज़र था। जब उसने यह जाना कि इस्राइल का परमेश्वर ही सच्चा परमेश्वर है और सृष्टिकर्ता है तब बाइबल बताती है कि वह परमेश्वर से प्रार्थना करने लगा और प्रार्थना में उसने कुछ नहीं मांगा, उसकी स्तुति और महिमा के शब्द कहे।

पढ़ें। 

"उन दिनों के बीतने पर, मुझ नबूकदनेस्सर ने अपनी आंखें स्वर्ग की ओर उठाईं, और मेरी बुद्धि फिर ज्यों की त्यों हो गई; तब मैं ने परमप्रधान को धन्य कहा, और जो सदा जीवित है उसकी स्तुति और महिमा यह कह कर करने लगा: उसकी प्रभुता सदा की है और उसका राज्य पीढ़ी से पीढ़ी तब बना रहने वाला है।" दानिय्येल 4:34 

प्रार्थना परमेश्वर की प्रशंसा और स्तुति है। जब भी आप प्रार्थना करें आप आंखें बंद करके परमेश्वर के लिए कोई भी प्रशंसा का गीत गाएं जो आपको आता हो। अगर आपको कोई साज़ बजाना आता है तो आप उस गीत को तार वाले साज़ या बाजों पर गाएं। मैं आपको एक अपना लिखा गीत सुनाता हूं जिसे मैंने पवित्र आत्मा की सहायता से लिखा और उसको परमेश्वर की महिमा के लिए तैयार किया आप इसे सीख सकते हैं और अपने घरों में व संगति के वक्त गा सकते हैं। इस अध्याय में व गीत का वीडियो आपको मिल जाएगा।


 यशायाह कहता है "हम तो अपने रचे गीत परमेश्वर की महिमा के लिए गाएंगे।"

अगर आप गीत बनाना नहीं जानते तो हर वह बात जिसे आप परमेश्वर की प्रशंसा और स्तुति में कहते हैं वह भी तो एक गीत ही है। बाइबल बताती है "हे परमेश्वर, मैं तेरी स्तुति का नया गीत गाऊंगा; मैं दस तार वाली सारंगी बजा कर तेरा भजन गाऊंगा।" अगर आपको साज़ बजाना नहीं आता तो कोई भी परमेश्वर की स्तुति के लिए साज़ बजाना सीखे और अगर आप नहीं भी सीख सकते तो ताली बजा कर परमेश्वर की महिमा और स्तूती कर सकते हैं। अगर आप साज़ बजाना जानते हैं तो आप चर्च में व प्रार्थना सभाओं में अपनी व्यक्तिगत प्रार्थनाओं में परमेश्वर की महिमा जरूर करें। परमेश्वर स्तुति से भरी प्रार्थनाओं को बहुत पसंद करते हैं। मैं अपनी प्रार्थना की शुरुआत बाजे, साजों व गीतों के साथ करता हूं। दाऊद वीणा बजाकर परमेश्वर की महिमा करता था। बाइबल बताती है "उसके लिये नया गीत गाओ, जयजयकार के साथ भली भांति बजाओ॥ मैं हर समय यहोवा को धन्य कहा करूंगा; उसकी स्तुति निरन्तर मेरे मुख से होती रहेगी।"

अगर आपको संगीत नहीं आता तो अपने शब्दों से उसकी महिमा करें पर उसकी स्तुति और जय जयकार जरूर करें।

2. Confession in Prayer; प्रार्थना में पश्चाताप:

परमेश्वर के सामने अपने गुनाहों को स्वीकार करना और पश्चाताप करना यानी अब से यह नहीं दौहराया जाएगा। परमेश्वर ऐसी प्रार्थना को कभी नजरअंदाज नहीं करते ध्यान रखें हो सकता है आप 10 हुकुमों का पालन करते हों या प्रतिदिन यीशु की आज्ञाएं मानते हों और आपको ऐसा प्रतीत होता हो कि आपने कोई गलती नहीं की पर यह बात नए व पुराने मसीहों के लिए भी समझना जरूरी है हमें प्रतिदिन अपने गुनाहों की माफी मांगनी है क्योंकि मनुष्य गुनहगार है और हजारों खामियां मनुष्य के अंदर हैं जो हमारे अनंत जीवन में प्रवेश के लिए बाधा बन सकती हैं। जैसे जलन, आलस्य, बैर-भाव, झगड़ा व क्रोध आदि। हम अपने आप से पवित्र नहीं बन सकते न ही पवित्रता एक दिन का काम है। पवित्रता अंश अंश करके जीवन व स्वभाव में आती है यह एक मार्ग है जिसमें एक विश्वासी कई दफा ठोकर खाता है और गिरता है फिर उठकर संभलता है। मनुष्य कामिल नहीं है इसलिए पवित्र भी नहीं है। पवित्रता स्वभाव और जीवन की गलतियों और गुनाहों पर विजय प्राप्त करके आती है और यह प्रतिदिन के प्रयास और प्रयत्न और मसीही जीवन के सफर में प्रतिदिन का काम है जिसमें परमेश्वर हमारी सहायता करते हैं। प्रार्थना में हम यही काम करते हैं हम प्रतिदिन पश्चाताप करते हैं और अपनी कमजोरियों और गुनाहों पर विजय पाने की सहायता खुदा से मांगते हैं।

ध्यान रहे प्रभु यीशु मसीह ने कहा ठोकरों का लगना अवश्य है यानी गलतियां मनुष्य से हो सकती हैं। परमेश्वर ने मनुष्य के भीतर समझ रखी है जो सही और गलत को पहचानने की क्षमता रखती है इसलिए ठोकरों का लगना अवश्य पर ठोकर पर पांव मार लेना यानी जान बूझ कर गुनाह करना वह गुनाह है जो जहन्नुम के दरवाजो़ तक ले जाता है।

बाइबल बताती है एक मंदिर में दो जन प्रार्थना कर रहे थे, एक फरीसी था और दूसरा चुंगी लेने वाला। फरीसी खड़ा होकर अपने मन में यों प्रार्थना करने लगा, कि हे परमेश्वर, मैं तेरा धन्यवाद करता हूं, कि मैं और मनुष्यों की नाईं अन्धेर करने वाला, अन्यायी और व्यभिचारी नहीं, और न इस चुंगी लेने वाले के समान हूं। मैं सप्ताह में दो बार उपवास करता हूं; मैं अपनी सब कमाई का दसवां अंश भी देता हूं। परन्तु चुंगी लेने वाले ने दूर खड़े होकर, स्वर्ग की ओर आंखें उठाना भी न चाहा, वरन अपनी छाती पीट-पीटकर कहा; हे परमेश्वर मुझ पापी पर दया कर। यीशु कहते हैं

मैं तुम से कहता हूं, कि वह दूसरा नहीं; परन्तु यही मनुष्य धर्मी ठहराया जाकर अपने घर गया; क्योंकि जो कोई अपने आप को बड़ा बनाएगा, वह छोटा किया जाएगा; और जो अपने आप को छोटा बनाएगा, वह बड़ा किया जाएगा॥ लूका 18:14-10

दोनों जन विश्वासी थे पर प्रार्थना के भाव और प्रार्थना की मंशाएं अलग अलग हैं ध्यान दें विश्वासी अपने को बहुत धर्मी मान रहा है परंतु दूसरा नहीं मान रहा दूसरा कह रहा है कि वह पापी है और वह अपने गुनाहों की क्षमा मांग रहा है। वह अपने गुनाहों मानकर अपनी कमजोरियों पर जीत हासिल करने के लिए परमेश्वर से प्रार्थना कर रहा है। कहने का मतलब है कि परमेश्वर के ठहराए नियम या चर्च के नियमों का पालन करने के द्वारा हम पवित्र नहीं बन सकते। हम पवित्र और धर्मी ठहराए जाते हैं जब हम अपने गुनाहों की माफ़ी मांगते हैं, अपनी गलतियों को सुधारते हैं और छोटी-छोटी गुनाहों का पश्चाताप करके अपने जीवन से दूर करते हैं और विजय पर विजय प्राप्त करके शुद्धता और पवित्रता की ओर बढ़ते जाते हैं। "यदि हम अपने पापों को मान लें, तो वह हमारे पापों को क्षमा करने, और हमें सब अधर्म से शुद्ध करने में विश्वासयोग्य और धर्मी है।" 1 यूहन्ना 1:9 "यदि कहें कि हम ने पाप नहीं किया, तो उसे झूठा ठहराते हैं, और उसका वचन हम में नहीं है॥" 1 यूहन्ना 1:10

हमारा अनंत जीवन इस बात पर निर्भर करता है कि हम अपने स्वभाव से कमी कमजोरियां और छोटे-छोटे गुनाहों को दूर करके और उन पर जीत हासिल करके अपने स्वभाव में प्रभु यीशु का कोई भी एक स्वभाव अपने भीतर ला सकें। जब एक कमजोरी पर आप फतेह हासिल करें तब दूसरी कमजोरी को पकड़कर उसे दूर करें। आपका मसीही जीवन और परिवार एक बगीचे के समान है जिसमें आत्मिक फल और फूल लगे हैं और हमारी कमियां और छोटे-छोटे गुनाह उसको खराब करते हैं बाइबल बताती है "जो छोटी लोमडिय़ां दाख की बारियों को बिगाड़ती हैं, उन्हें पकड़ ले, क्योंकि हमारी दाख की बारियों में फूल लगे हैं॥" श्रेष्ठगीत 2:15

प्रार्थना में पश्चाताप ज़रूरी है ताकि परमेश्वर हमको यीशु मसीह के स्वभाव की समानता में बदल सकें। 

आपको पिछले अध्याय में कहा गया था कि आपको प्रभु की प्रार्थना यानी "ऐ हमारे बाप" की दुआ याद करने के लिए कहा गया था मेरा विश्वास है आपने उसे याद कर लिया होगा। उस प्रार्थना में यीशु पश्चताप के विषय में सिखाते हैं। उन्होंने कहा प्रार्थना में यह कहा करो 'तू हमारे गुनाहों को क्षमा कर और हमें बुराई से बचा।" और यह प्रार्थना यीशु ने इसलिए सिखाई ताकि हम प्रतिदिन पश्चाताप करें और क्षमा मांगे। यीशु चेलों को इस गंभीर विषय को बार-बार सिखाते थे। वे कहते थे चौकस रहो जागते रहो ताकि कहीं किसी कमजोरी और गुनाह में न पड़ जाओ। मती 26:41

आपकी प्रार्थना में अपना पश्चाताप जरूर रखें आप की कमजोरियां और आपके छोटे बड़े गुनाह आप ही बेहतर जानते हैं। क्योंकि बाइबल बताती है जैसा लिखा है, "कि कोई धर्मी नहीं, एक भी नहीं। हम तो सब के सब अशुद्ध मनुष्य के से हैं, और हमारे धर्म के काम सब के सब मैले चिथड़ों के समान हैं।"

बड़े से बड़ा प्रभु का दास भी प्रतिदिन पश्चाताप करता है। यीशु मसीह में हम पवित्र धार्मिक कामिल सिद्धता में आगे बढ़ते जाते हैं। हमें हमारी कमियां पता होती हैं वरना वचन व आईना है जो हमें हमारी कमियों को दिखाता है। 

कई वर्षों तक मैंने परमेश्वर की सेवकाई को महत्व नहीं दिया पर जब मैंने वचन से पॉलूस उसके जीवन को करीब से जाना तो मेरे पासबानी जीवन में एक बदलाव आया और मेरे लिए खुदा की सेवा प्राथमिकता बन गई। मैंने पश्चाताप किया प्रार्थना की परमेश्वर ने मेरी सहायता की और आज सेवकाई मेरा मकसद है जिसे परमेश्वर ने मुझे सिखाया है।

अपनी प्रार्थना में जीवन परिवर्तित करने वाले प्रार्थना के मूल तत्व पश्चात को आप जरूर रखें। क्योंकि वह आपकी कमजोरियों में जीत दिलाने में आपकी सहायता करेगा। इसका मतलब प्रतिदिन की प्रार्थना आपको मसीह के स्वभाव में बदलती है। 

"यदि हम अपने पापों को मान लें, तो वह हमारे पापों को क्षमा करने, और हमें सब अधर्म से शुद्ध करने में विश्वासयोग्य और धर्मी है।" 1 यूहन्ना 1:9

3. Intercede in Prayer; मध्यस्थता की प्रार्थना:

मध्यस्थता की प्रार्थना परमेश्वर को बहुत भाती है। प्रिय नए विश्वासी आप याद रखें यह प्रार्थना का वक्त है जिसमें आप न तो अपने लिए न अपने परिवार के लिए प्रार्थना करते हैं पर आप दूसरों के लिए दूसरी संस्थाओं, कलीसियाओं, पासबानों मसीही समाज व बिमारों, ग़रीब व लाचारों के लिए प्रार्थना करते हैं। मध्यस्था की प्रार्थना अपने स्वार्थ को छोड़कर दूसरों के लिए की जाती है। अपनी प्रार्थना में दूसरों के लिए प्रार्थना ज़रूर करें। ऐसा करने के लिए हमें बाइबल बताती है, मध्यस्था एक सेवा है। मध्यस्था प्रार्थना योद्धाओं का काम है और मसीही सबसे पहले एक प्रार्थना योद्धा है।

Purpose of Intercession मध्यस्थता की प्रार्थना का उद्देश्य-

1. मध्यस्थता की प्रार्थना का मकसद बाइबल के अनुसार यह है कि हम अंधकार में दबे जीवनों को यीशु के प्रकाश में लाकर बचा सके।

2. मध्यस्थता की प्रार्थना का मकसद यह है कि हम उन जीवनों के लिए निरंतर प्रार्थना करें जो यीशु मसीह को जानते तो हैं पर मानते नहीं। उन्होंने अभी उसका स्वाद नहीं चखा।

3. मध्यस्था की प्रार्थना का मकसद कठोर हृदय जब तक परमेश्वर के सम्मुख दीनता वह नम्रता के साथ अपना समर्पण न कर दें तब तक उन्हें बचाने के लिए हमें प्रार्थना करनी है। बाइबल मध्यस्थता की प्रार्थना करने वालों को पहरुवे (watchman) के रूप में दिखाती है।

4. मध्यस्थता की प्रार्थना का मकसद बिमारों के लिए शिफा मांगना है ताकि वह शारीरिक मानसिक व आत्मिक चंगाई पाकर मन फिरायें।

5.मध्यस्थता की प्रार्थना का मकसद कलीसिया को द्वितीय आगमन के लिए तैयार करना है। और संपूर्ण संसार शहर देश में से शैतानी राजतंत्र को उखाड़ फेंकना है।

यीशु मसीह ने मध्यस्था की प्रार्थना को ऐसे समझाया: 

मेरा पिता किसान है और स्वामी ने माली से कहा इस पेड़ को काट डाल क्योंकि यह नहीं फलता तब माली ने उस पेड़ के लिए विनती की या कहें उस पेड़ को बचाने के लिए intercede किया या मध्यस्थ हुआ।माली स्वामी और पेड़ के मध्य में स्थित हो गया और उसके लिए अनुरोध किया कि इस वर्ष इस वृक्ष को छोड़ दे मैं इसकी देखभाल करूंगा अगर यह फला तो ठीक है वरना उसको काट डालना। किसी के लिए (on behalf of) परमेश्वर के सम्मुख उसके जीवन को बचाने की विनती करने को ही मध्यस्थता कहते हैं।

बाइबल बताती है यीशु हमारे लिए निरंतर विनती करते हैं और मध्यस्थ होकर परमेश्वर और हमारे बीच की बीचवाई को खत्म करते हैं। 


बाइबल बताती है प्रभु यीशु मसीह मध्यस्थ होकर परमेश्वर से हमारे लिए विनती करते हैं पर क्या हम अपने को फलवंत बनने के लिए अपने जीवन में उसके होने वाले कामों को स्वीकृति देते हैं? उसका वचन अपने हृदय में अधिकाई से बसने दे ताकि आप फलवंत हो सकें। "इसीलिये जो उसके द्वारा परमेश्वर के पास आते हैं, वह उन का पूरा पूरा उद्धार कर सकता है, क्योंकि वह उन के लिये बिनती करने को सर्वदा जीवित है॥ "इब्रानियों 7:25 

अपनी प्रार्थना में आप दूसरों के लिए जरूर प्रार्थना करें। बाइबल बताती है "अब मैं सब से पहिले यह उपदेश देता हूं, कि बिनती, और प्रार्थना, और निवेदन, और धन्यवाद, सब मनुष्यों के लिये किए जाएं।" 1 तीमुथियुस 2:1

मध्यस्थ की प्रार्थना व्यक्तिगत सामूहिक कलिसीयाई प्रार्थना योद्धाओं के साथ की जाती है, इसे आप अकेले में भी कर सकते हैं। इसलिए जब भी आप प्रार्थना करें दूसरों के लिए अवश्य करें। बाइबल बताती है यीशु सिखाते हैं "जो तुम्हें स्राप दें, उन को आशीष दो: जो तुम्हारा अपमान करें, उन के लिये प्रार्थना करो। "लूका 6:28

अपने देश व शहर विश्व के लिए जरूर प्रार्थना करें क्योंकि परमेश्वर ऐसे लोगों को व कलिसीयाओं को ढूंढते हैं जो मध्यस्थ होकर परमेश्वर से उनके लिए प्रार्थना करें। बाइबल बताती है "और मैं ने उन में ऐसा मनुष्य ढूंढ़ना चाहा जो बाड़े को सुधारे और देश के निमित्त नाके में मेरे साम्हने ऐसा खड़ा हो कि मुझे उसको नाश न करना पड़े, परन्तु ऐसा कोई न मिला।" यहेजकेल 22:30 "उसने देखा कि कोई भी पुरूष नहीं, और इस से अचम्भा किया कि कोई बिनती करने वाला नहीं; तब उसने अपने ही भुजबल से उद्धार किया, और अपने धर्मी होने के कारण वह सम्भल गया।" यशायाह 59:16

इसलिए आप दूसरों के लिए प्रार्थना जरूर करें।

4. Request in Prayer; प्रार्थना में विनती:

प्रिय नये विश्वासी हम अपने महान  सर्वशक्तिमान सृष्टिकर्ता के सामने बड़े आदर और मान सम्मान के साथ अपने निवेदन रखते हैं। यह सच है कि वह हमसे प्यार करता है वह हमारा मित्र है हमारा पिता है और हर वक्त हर परिस्थिति में वह हमारे साथ हैं पर आप इस बात को ्स्समझें प्रार्थना हमें इस भाव से करनी चाहिए जिसमें निवेदन हो। परमेश्वर अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करने वाला कोई लकि ड्रॉ नहीं है। क्योंकि अगर प्रार्थना की है तो उसका उत्तर जरूर आएगा। आपकी की गई प्रार्थना का उत्तर तीन बातों में आता है हां, न या प्रतीक्षा करो पर उत्तर जरूर आएगा।

प्रिय विश्वासी परमेश्वर सृष्टिकर्ता बादशाहों का बादशाह है। जब हम उसके निकट आते हैं तो अपने मन में आदर रखें। यह सच है उन्होंने हमें "तू" बोलने की मित्रता दी है। पर ध्यान रहे उसका आदर हम अपने शब्दों से अपने व्यवहार से प्रकट करते हैं। परमेश्वर ने खुद अपने को इतना नम्र किया कि उसने गौशाला में पड़ी चरनी में जन्म लिया, दुख सहे, व क्रूस की वेदना झेली उन्होंने परमेश्वर का पुत्र होकर भी अपने को दीन किया। यीशु सिखाते हैं परमेश्वर की सेवा घमंड या गुरुर में नहीं बल्कि एक-दूसरे के चरणों को धोकर है।"यीशु ने यह जानकर कि पिता ने सब कुछ मेरे हाथ में कर दिया है और मैं परमेश्वर के पास से आया हूं, और परमेश्वर के पास जाता हूं। तब बरतन में पानी भरकर चेलों के पांव धोने और जिस अंगोछे से उस की कमर बन्धी थी उसी से पोंछने लगा।" यूहन्ना 13:3 & 5 बाइबल बताती है प्रभु के सामने दीन बनो तो वह तुम्हें शिरोमणि बनाएगा।

मैं अपने विद्यालय के प्रधानाचार्य अपने माता पिता, अपने बिशप या अपने से बुजुर्ग के सामने सिर उठाकर बात करने की हिमाकत नहीं कर सकता। ज़रा सोचें परमेश्वर ने इन सब को बनाया है उनका आदर मान सम्मान कितना जरूरी होगा। बाइबल बताती है "बातें करने में उतावली न करना, और न अपने मन से कोई बात उतावली से परमेश्वर के साम्हने निकालना, क्योंकि परमेश्वर स्वर्ग में हैं और तू पृथ्वी पर है; इसलिये तेरे वचन थोड़े ही हों॥" सभोपदेशक 5:2

दुनिया का सबसे बुद्धिमान मनुष्य कहता है जब तुम परमेश्वर के मंदिर में आओ या परमेश्वर के पास आओ तो आदर के साथ आना। बाइबल बताती है बातें करने में उतावली न करना, और न अपने मन से कोई बात उतावली से परमेश्वर के साम्हने निकालना, क्योंकि परमेश्वर स्वर्ग में हैं और तू पृथ्वी पर है; इसलिये तेरे वचन थोड़े ही हों॥ इसलिए किसी भी बात की चिन्ता मत करो: परन्तु हर एक बात में तुम्हारे निवेदन, प्रार्थना और बिनती के द्वारा धन्यवाद के साथ परमेश्वर के सम्मुख अपस्थित किए जाएं।

फिलिप्पियों 4:6

5. Thank offering; प्रार्थना में धन्यवाद की भेंट:

प्रार्थना में धन्यवाद एक खास महत्व रखता है। धन्यवाद के द्वारा हम अपने विश्वास को प्रकट करते हैं कि हमारी प्रार्थना सुन ली गई है पूरी भी हो गई है। आपकी व्यक्तिगत प्रार्थना, पारिवारिक, सामूहिक प्रार्थना में धन्यवाद होना सबसे ज्यादा जरूरी तत्व है। एक बार प्रभु यीशु मसीह ने 5000 की भीड़ को आत्मिक भोजन खिलाया और फिर उसने 5000 कि उसी भीड़ को शारीरिक भोजन खिलाया पर यीशु ने बहुत छोटी प्रार्थना की और कहा हे पिता मैं धन्यवाद देता हूं इस भोजन पर आशीष कहकर उसने रोटी तोड़ी और बाइबिल बताती है कि 5000 लोगों की 3/4th यहूदी जनसंख्या ने भर पेट खाया और 12 टोकरे भी बच गए। धन्यवाद की प्रार्थना आशीषों को गुणा करती है। धन्यवाद की प्रार्थना से यीशु ने 4 दिन के मुर्दे को जला दिया। उस प्रार्थना में प्रभु यीशु मसीह ने कहा मैं तेरा धन्यवाद करता हूं तू मेरी हमेशा सुनता है और आज भी सुनेगा हे लज़र बाहर निकल आ! और लाज़र कब्र तोड़कर बाहर निकल आया। धन्यवाद की भेंटे अपने मुख से कहना हमारी प्रार्थना विनती निवेदन को पूरा करता है और इस बात की पुष्टि करता है कि प्रार्थना पूरी हो चुकी है। यीशु कहते थे "जो मांगा है उस पर विश्वास कर लेना व प्रतीति कर लेना कि मिल गया। बाइबल बताती है हम धन्यवाद करते हुए उसके सम्मुख आएं, और भजन गाते हुए उसका जय-जयकार करें!" भजन संहिता 95:2

उपसंहार

प्रिय नई विश्वासी मेरा विश्वास है कि आपने इन प्रार्थना के पांच मूल तत्वों को सीखा है आप इनको अपनी प्रार्थना में जरूर ध्यान रखें क्योंकि यह वह विशेष बातें हैं जो प्रार्थना में होनी चाहिए हम आगे आने वाले अध्ययनों में प्रार्थना के विषय को और अधिकाई से सीखेंगे प्रभु आपको आशीष दे आमीन ✝️


-PASTOR VIVEK SIMON-

Click here to buy SG Musical HARMONIUM

Click here to buy Khanjari











Comments

Popular posts from this blog

बुलाहट की पहचान!

COURSE FOR NEW BELIVERS अध्याय 1 निपुण चरवाहे की जरूरत