अध्याय 3 नए विश्वासीयो के प्राथमिक कार्य Do's for the New believers
अध्याय 3
नए विश्वासीयो
के प्राथमिक कार्य
Do's for the New believers
1. Regular connection with God in prayer:
नये विश्वासी जीवन निरंतर परमेश्वर के साथ बने रहें उससे दूर न हो और उसका सरल माध्यम है कि आप प्रार्थना में प्रतिदिन अपना वक्त बताएं। यह सच है कि कभी-कभी प्रार्थना का जीवन चिंताओं से और अपने परिवार की जरूरतों को और सुबह से लेकर शाम तक का परिश्रम और अपने सांसारिक कार्य को पूरा करने के अभाव के कारण कमजोर पड़ जाता है। प्रार्थना करना मसीही जीवन के लिए उतना ही जरूरी है जितना आपके शारीरिक विकास की प्रचुर मात्रा में विटामिंस की जरूरत होती है और उसमें से एक भी कम हो जाए तो कोई भी डिफिशिएंसी सिंड्रोम या शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता खत्म हो सकती है।अनंत जीवन के लिए जो सबसे महत्वपूर्ण काम है उसमें से येशु सबसे ऊपर की श्रेणी में प्रार्थना रखते हैं। बाइबल बताती है "आशा में आनन्दित रहो; क्लेश में स्थिर रहो; प्रार्थना में नित्य लगे रहो"।
प्रार्थना में आराधना जिसे परमेश्वर की भक्ति कहते हैं, हमें परमेश्वर के साथ इस व्यस्त उलझे जीवन में बने रहने का रास्ता देती है जिसमें आप प्रतिदिन चल सकते हैं। प्रार्थना की कमी एक मसीही जीवन को परमेश्वर से दूर कर सकती है। जीवन में प्रार्थना की कमी को प्रभु येशु परमेश्वर से मन की दूरी कहते हैं। यीशु साफ शब्दों में कहते हैं "वे मुख से तो मेरा आदर करते हैं परंतु उनका मन मुझसे दूर रहता है।"
प्रभु यीशु चेलों को अपने पकड़े जाने के अंत तक सिखाते रहे क्या तुम मेरे साथ एक घड़ी भी जाग न सके प्रार्थना करने के लिए।
प्रभु यीशु मसीह ने चेलों को प्रार्थना की सामर्थ को मुंह जबानी सिखाया वे कहते थे "और जो कुछ तुम प्रार्थना में विश्वास से मांगोगे वह सब तुम को मिलेगा।"
गूंगी बहरी दुष्ट आत्मा के विषय प्रभु यीशु मसीह कहते हैं "यह जाति बिना उपवास और प्रार्थना के नहीं निकलती" इसका मतलब यीशु मसीह चेलों को प्रार्थना की शक्ति उससे होने वाले प्रभाव और सामर्थ को समझा रहे थे।
प्रभु यीशु मसीह ने प्रार्थना की सामर्थ को प्रैक्टिकल यानी वास्तव में दिखाया। जिसने 5000 की भीड़ को पांच रोटी दो मछली से तृप्त कर दिया और 4 दिन के मुर्दे को जिसका नाम लाज़र था कब्र में से बाहर निकाल दिया। यीशु ने और भी सामर्थ के काम किए। और प्रार्थना की सामर्थ को वास्तव में चेलों को दिखाया चेले अचंभा करते थे गुरु यह तूने कैसे कर दिया प्रभु यीशु मसीह ने कहा "तुम इससे भी बड़े-बड़े काम करोगे।"
फिर चलों के ही कहने से प्रभु यीशु मसीह ने उन्हें प्रार्थना कैसे करनी चाहिए वह सिखाया।
"सो तुम इस रीति से प्रार्थना किया करो: “हे हमारे पिता, तू जो स्वर्ग में है; तेरा नाम पवित्र माना जाए। तेरा राज्य आए; तेरी इच्छा जैसी स्वर्ग में पूरी होती है, वैसे पृथ्वी पर भी हो। हमारी दिन भर की रोटी आज हमें दे। और जिस प्रकार हम ने अपने अपराधियों को क्षमा किया है, वैसे ही तू भी हमारे अपराधों को क्षमा कर। और हमें परीक्षा में न ला, परन्तु बुराई से बचा; क्योंकि राज्य और पराक्रम और महिमा सदा तेरे ही हैं।”आमीन।
यह प्रभु की प्रार्थना है जिसे चर्च में हर प्रार्थना सभा में आपको सबके साथ बोलना पड़ेगा इसलिए आप इस प्रार्थना को याद करें ले। मत्ती 6:9-13
चेलों को प्रभु यीशु मसीह ने प्रार्थना को किस आदर के साथ करना चाहिए वह सिखाया यीशु कहते थे "और जब तू प्रार्थना करे, तो कपटियों के समान न हो क्योंकि लोगों को दिखाने के लिये सभाओं में और सड़कों के मोड़ों पर खड़े होकर प्रार्थना करना उन को अच्छा लगता है; मैं तुम से सच कहता हूं, कि वे अपना प्रतिफल पा चुके। परन्तु जब तू प्रार्थना करे, तो अपनी कोठरी में जा; और द्वार बन्द कर के अपने पिता से जो गुप्त में है प्रार्थना कर; और तब तेरा पिता जो गुप्त में देखता है, तुझे प्रतिफल देगा। प्रार्थना करते समय अन्यजातियों की नाईं बक बक न करो; क्योंकि वे समझते हैं कि उनके बहुत बोलने से उन की सुनी जाएगी।"
फिर यीशु ने प्रार्थना की कमी के कारण होने वाले नुकसान बताएं। यीशु कहते थे "प्रार्थना करो वरना परीक्षा में गिर पड़ोगे प्रार्थना करो ताकि आजमाइश (परीक्षा) में ना पड़ो।"
यीशु ने खुद रात- रात भर प्रार्थना करके चेलों को सिखाया की प्रार्थना परमेश्वर का पुत्र भी कर रहा है।
फिर भी चले येशु के कहने से प्रार्थना करने के लिए एक रात भी ना जाग सके। यह सब बातें यीशु मसीह के जरिए से हमें सिखाईं पर क्या हम प्रार्थना जैसे मुबारक वक्त के लिए अपना समय अपने व्यस्त जीवन में से निकाल पाते हैं?? अगर नहीं तो आप प्रिय मसीही नए विश्वासी इस बात को सीखे व समझे की प्रतिदिन की प्रार्थना आपके अनंत जीवन के लिए आपको जीवित रखने की सांसे हैं।
प्रार्थना का मकसद सिर्फ अपनी जरूरत और आवश्यकताओं को पूरा करना नहीं है क्योंकि परमेश्वर आपकी जरूरतों को पहले से जानते हैं। आप परमेश्वर से मांगे और अपने मन के विचारों को उसके सामने प्रकट करें। पर दरअसल प्रार्थना का मकसद परमेश्वर के साथ एक संबंध स्थापित करना है व उस संबंध को और गहराई से मजबूत बनाना है। इसलिए प्रभु यीशु मसीह प्रभु की प्रार्थना में शुरुआत ही पहले वाक्य से यह कहकर करते हैं, हे पिता हे अब्बा या ऐ हमारे बाप। यानी आपका और मेरा परमेश्वर के साथ एक ऐसा अटूट संबंध प्रार्थना में प्रभु यीशु मसीह ने पहले ही प्रभु की प्रार्थना के पहले वाक्य में जोड़ दिया कि वह एक पिता और हम उसके पुत्र और पुत्रियों का अटूट संबंध है।
एक लकवे के रोगी को लोग प्रभु यीशु मसीह के पास लेकर आए और प्रभु यीशु मसीह से उसे एकदम चंगाई नहीं दी। परंतु सबसे पहले कहा "बेटे" यानी अपना और उसका एक संबंध सबसे पहले बनाया फिर उसके बाद भी प्रभु यीशु मसीह ने उसको चंगाई नहीं दी। यीशु ने कहा तेरे पाप जो बहुत थे क्षमा हुए। यानी प्रभु यीशु मसीह ने सबसे पहले उसके अंतर्मन को और टूटे बिखरे आत्मविश्वास को अंदर से अंदरूनी चंगाई दी है। फिर उसके बाद प्रभु यीशु मसीह ने उसके शरीर को चंगाई दी और कहा अपनी खाट उठा और चल फिर।
किसी के जीवन में चंगाई आने से पहले उसका जीवन सबसे पहले परिवर्तित होगा फिर उसके बाद उसका संबंध परमेश्वर के साथ बनना शुरू होगा (प्रार्थना के द्वारा) फिर उसके जीवन की परिस्थितियां बदल जाएंगी परमेश्वर ऐसे ही काम करते हैं।
रुकी हुई प्रार्थनाओं के जवाब तो बाद में मिलेंगे पहले हम अपना संबंध परमेश्वर के साथ मजबूत बनाते चले जाएं वह हमारी जरूरतों को और आवश्यकताओं को हमारे आने वाले जीवन और उसकी आवश्यकताओं को पहले से ही जानते हैं।
यीशु का प्रार्थनामय जीवन था यीशु परमेश्वर के पुत्र हैं फिर भी वे प्रार्थना करते थे क्योंकि प्रार्थना उनको परमेश्वर की उपस्थिति का एहसास दिलाती थी।
प्रार्थना एक जबरदस्त विषय है जिसे हमें पता होना चाहिए आने वाले अध्यायों में हम प्रार्थना के विषय सीखेंगे मसीही जीवन की शुरुआत में आप सबसे पहले प्रार्थना करते रहें 1 दिन भी प्रार्थना के बिना ना बिताएं। अपने परमेश्वर के साथ अपना संबंध प्रार्थना के माध्यम से पुख्ता और मजबूत बनाएं।
2. Regular intake of the word of God:
वचन बताता है हम परमेश्वर के चेले जब तक नहीं बन सकते जब तक हम उसके वचन को लगातार खुराक ना बनाएं यानी उसको ना पढ़े।
प्रभु यीशु मसीह सिखाते हैं "अगर तुम मेरे वचन में बने रहो तभी मेरे चेले ठहरोगे।"
परमेश्वर के वचन को निरंतर खुराक बनाये यानी उसको पढ़ें। अभी नए विश्वासी बाइबल को पढ़ने में गंभीरता से अपना मन लगाएं। जिस सामर्थ के द्वारा आप प्रभु में लाए गए हैं वह परमेश्वर ही की है, पर उस परमेश्वर की महिमा हो जिस दास के द्वारा आपको वचन सुनाया गया था, या जिन परिस्थितियों में आप थे उन परिस्थितियों में से परमेश्वर ने आप को बाहर निकाल कर एक गवाही के रूप में तैयार किया है और आपको प्रभु यीशु मसीह के प्रकाश में आने का बहुमूल्य वरदान मिला है। यह अद्भुत है।
जी हां जो वचन आपके हाथों में है वही सृष्टि के आरंभ से अस्तित्व में है।
"जो एक जीवन को मसीह पर विश्वास करने से उद्धार प्राप्त करने के लिए बुद्धिमान बना सकता है; क्योंकि यह परमेश्वर के द्वारा हम तक पहुंचाया गया है और उपदेश समझाने, सुधारने और धार्मिकता की शिक्षा के लिए बड़ा लाभदायक है।"
अगर आप को पवित्र शास्त्र बाइबल नहीं समझ आती तब भी आप उसे पढ़े। अभी शुरुआत में आप वचन को सिर्फ पढ़ें और 1 वर्ष में पढ़कर पूरा समाप्त करें।
एक बुजुर्ग पासबान जिनका नाम स्वर्गीय फतेह बहादुर चंद था उन्होंने बाइबल को अपने जीवन काल में 10 बार पढ़कर खत्म किया।
हम आने वाली अध्यायों में आपकी सहायता करेंगे कि पवित्र शास्त्र बाइबल कैसे पढ़ें व कैसे अध्ययन करें। आप परिवार के साथ और व्यक्तिगत रूप बाइबिल को 1 वर्ष में पढ़कर पूरा करें।
3. Always remember ! Learn something new with your Pastor:
जब आप अपने पासबान से वचन सुनते हैं तो आप उससे कुछ ना कुछ नया सीखें वो आपके आत्मिक शिक्षक हैं। यह सच है कि पवित्र आत्मा आपको बहुत प्रभावशाली तरीके से सिखाता है। पर आप हमेशा यह बात ध्यान में रखें कि जो स्थानीय पासबान आप के संपर्क में दिये गए हैं वह परमेश्वर की ओर से हैं। यह कोई नई बात नहीं, आप इस बात को जानते हैं।
आप अपने पास एक छोटी नोटबुक रख सकते हैं Diary with Pen खरीदें और खास विशेष याद करने वाले योग्य बाइबल के पद व आयतों को वह खास बातों को पासवान के बताए विशेष केंद्र मनन करने योग्य बिंदुओं को लिखें और उस विषय से संबंध रखने वाली बातों को जिन्हें प्रचार किया जा रहा है उनको जरूर पढ़ें व याद करें यह काम आपको प्रतिदिन करना है। इस काम को आप बोझ न बनाएं जब तक एक आयत आपको याद ना हो जाए उसे मन में याद करें मनन करें। इसके साथ ही आप उनसे वचन पढ़ने के बाद जो आप अपने घर परिवार प्रतिदिन पढ़ते हैं, यदि कुछ न समझ आए तो उनसे जरूर पूछें। अपने पासबान के संपर्क में रहें व उनसे हमेशा कुछ नया सीखें। पासबान के द्वारा रखे गए बाइबल अध्ययन पाठ्यक्रम में जरूर भाग लें और अध्ययन के बाद होने वाले वार्तालाप में अपने प्रश्न जरूर पूछें। याद रखें बाइबल अध्ययन पाठ्यक्रम आपके और संडे स्कूल पाठ्यक्रम में आपके बच्चों की सहभागिता बहुत ज्यादा जरूरी है उसको कभी न छोड़े उसके लिए हमेशा समय निकालें।
4. Always fellowship with mature Christians:
मसीही जीवन में ना सिर्फ नए विश्वासियों को संगति से जुड़े रहना है परंतु पूरा कलीसियाई परिवार संगति में सहभागिता रखे। जब भी आपके चर्च में कोई कार्यक्रम हुआ जिसमें पासवान पूरी कलीसिया को आमंत्रित करें उसमें कोई भाग ले न ले पर आपकी उपस्थिति उस कार्यक्रम में सबसे पहले होनी चाहिए। संगति करना चर्च को यीशु ने सिखाया। कलीसिया का मतलब मसीही मंडली या कहें मसीही परिवारों का समूह जिसको प्रभु यीशु मसीह ने बनाया है। हम यह एक कलीसिया की बात नहीं कर रहे हम यहां विश्व की समस्त कलिसीयाओं की बात कर रहे हैं जिसमें प्रभु यीशु मसीह ने भविष्यवाणी करके यह कहा मैं अपनी कलीसिया स्थापित करूंगा। प्रभु यीशु मसीह ने यहां पर पहली बार कलीसिया शब्द का यानी चर्च शब्द का इस्तेमाल किया। यीशु कहते हैं
"और मैं भी तुझ से कहता हूं, कि तू पतरस है; और मैं इस पत्थर पर अपनी कलीसिया बनाऊंगा: और अधोलोक के फाटक उस पर प्रबल न होंगे।" मत्ती16:18
यानी प्रभु यीशु जब पतरस से यह कह रहे थे तो उनको पता था कि यह परमेश्वर की इच्छा वह बड़ी योजना का हिस्सा है कि प्रत्येक मसीही को एक साथ मिलकर आराधना करनी होगी। अलग-अलग नहीं व्यक्तिगत रूप से नहीं या अपने अपने परिवारों के साथ नहीं परंतु प्रत्येक मसीही जन को कलिसीयाई परिवार के संग मिलकर कलीसिया यानी चर्च के आराधनालय में इकट्ठा होकर आराधना का हिस्सा बनना होगा। प्रभु यीशु मसीह के जाने के बाद पहली कलीसिया संगति को महत्व देती थी। बाइबल बताती है की पहली कलीसिया के नए विश्वासी अपने पासबानो से "शिक्षा पाने, और संगति रखने में और साथ में भोजन करने में और प्रार्थना करने में लौलीन रहे। यीशु कहते हैं "जहां दो या तीन मेरे नाम से इकट्ठा होंगे तो मैं वहां हाजिर होऊंगा।" प्रभु यीशु इस बात से हमें सिखाना चाहते थे कि "इकट्ठा रहना" चाहे 2 या 3 या 3 से ज्यादा वहां वह जरूर आराधना में शामिल होंगे।
मैं बहुत बोझ के साथ इस बात को आपको सिखाना और समझाना चाहता हूं यह दो या तीन लोग आपके परिवार के भी हो सकते हैं पर अगर आप के शहर के स्थानीय इलाके में कोई चर्च इमारत है जहां अन्य मसीही आकर आराधना करते हैं वहां आप परिवार सहित संगति जरूर शुरू करें। क्योंकि चर्च इमारत इबादत का पवित्र स्थान है अगर वह इतना महत्वपूर्ण न होता तो यीशु 12 वर्ष की आयु में अपने माता-पिता के ढूंढने पर आराधनालय में न मिलते। अगर आराधनालय की इमारत जरूरी ना होती तो यह सबत के दिन आराधनालय में प्रचार, संगति व सामर्थ्य के काम कभी ना करते। अगर आराधनालय कलीसिया के प्रार्थना व आराधना करने का पवित्र स्थान न होता तो प्रभु यीशु मसीह कभी भी क्रोध में आकर मंदिर का शुद्धीकरण न करते और वह यह भी ना कहते के लिखा है मेरा आराधनालय प्रार्थना का घर कहलाएगा।
आपका स्थानीय चर्च की इमारत इतनी आसानी से बनाई गई धरोहर नहीं है यह इमारतें बड़े-बुजुर्गों व घुटनों के बल दुआ करके परिश्रम और बलिदान समय व धन खर्च करके बनाई गई है।जिन प्रभु के लोगों ने इनको खड़ा किया वह जानते थे कि वह प्रभु यीशु मसीह के दर्शन को पूरा कर रहे हैं। और आप उस दर्शन का बहुत बड़ा हिस्सा है। आप इसकी गंभीरता को समझें। उस इमारत में खड़े होने वाले लोग मसीही कलीसिया कहलाते हैं जिन का हिस्सा आप भी है। याद रखें व सीखे अपने स्थानीय चर्च इमारत में आराधना न करना व बार बार उसको बदलना आपके आत्मिक जीवन को नुकसान पहुंचा सकता है। प्रभु यीशु मसीह ने जो कहा कि जहां "दो या तीन मेरे नाम से" और दूसरी बात उन्होंने कहा "इकट्ठा होना"।
लोग इकट्ठा होते हैं किसी आंदोलन के लिए, छात्रों का समूह इकट्ठा होता है अपने विद्यालय में, डॉक्टर्स और स्टाफ नर्स इकट्ठा होती हैं चिकित्सालय में, देश के सैनिक इकट्ठे होकर एक आर्मी कहलाते हैं। इकट्ठा होने का एक विशेष कारण है।
एक बच्चा जब विद्यालय जाना शुरु करता है तो उसके व्यक्तित्व का निर्माण होता है उसकी ज्ञानेंद्रियां अन्य बच्चों के साथ एक आकार पाती हैं वह अपने को विकसित करता है हम एक सामाजिक प्राणी है हम अकेले रहने के लिए नहीं बनाए गए हैं तभी आपका भी परिवार है यहां तक कि परमेश्वर ने मनुष्य को यह आशीष जी की पृथ्वी में भर जाओ परमेश्वर भी अकेले रहना पसंद नहीं करते बाइबल बताती है इसलिए उन्होंने स्वर्गदूत बनाए मनुष्य को बनाया और कहा अगर दो या तीन भी होंगे तो भी मैं तुम्हारे साथ संगति करूंगा। शाम के ठंडे समय परमेश्वर अपने बच्चों से अपने परिवार से आदम हवा से संगति करने आते थे।
याद रहे परमेश्वर जीवित हैं और विज्ञान बताता है हर जीवित अपने को गुणाकर परिवार बनाता है परमेश्वर के परिवार में मैं और आप हैं। पर इसका मतलब यह कतई नहीं है कि आप अपने परिवार के दो चार लोगों के संग एक घर में अकेले संगति करें इस बात को कहकर कि येशु ने कहा था जहां दो या तीन मेरे नाम से इकट्ठा होते हैं वहां मैं हाज़िर हूं। इस बात से तो आपका कलीसियाई परिवार पूरा हुआ ही नहीं। अकेले आराधना करने का मतलब आप अपने परिवार के साथ हैं कलिसीयाई परिवार के साथ नहीं जिसे परमेश्वर ने स्थापित करने की भविष्यवाणी बहुत पहले कर दी थी।
इस कारण चर्च यानी कलिसीयाई परिवार के साथ हम इमारत में इकट्ठा होते हैैं यह बात हमने पहली कलिसीया में देखी है। आगे देखें बाइबल बताती है और वे सब विश्वास करने वाले इकट्ठे रहते थे, और उन की सब वस्तुएं साझे में थीं। और वे प्रति दिन एक मन होकर मन्दिर में इकट्ठे होते थे, और भोजन करते हुए आनन्द और मन की सीधाई से प्रतिदिन आराधना करते थे। प्रेरितों के काम 2:44-46
Cottage प्रार्थना का महत्व:
जब कोई कलिसीयाई परिवार का मसीही अपने घर में प्रार्थना रखें तब आप उसमें जरूर जाएं अगर उस परिवार ने आपको व्यक्तिगत रूप से निमंत्रण दिया है या पूरी कलीसिया को आमंत्रित किया हो तो आप भी वहां समय निकालकर जरूर जाएं और उस आराधना वचन का कोई भी कार्यक्रम न छोड़े उसका हिस्सा जरूर बनें ध्यान रहे आप विश्वास व परिपक्व मसीही जीवन में आगे बढ़ रहे हैं।
5. Always share your witness and of Christ:
यह सच है कि आप अगर मसीही जीवन के पहले पायदान पर हैं तो आपकी मसीह में आने की कोई न कोई गवाही जरूर होगी। आपके जीवन में यीशु मसीह का काम हुआ है बहुत से लोग इस आशीष से वंचित हैं। वही सामर्थ का काम जिसने आप को अंधकार से प्रकाश में खींचकर बचाया है। उसके बारे में पासबान से समय लेकर पूरी कलीसिया के सामने जरूर बताएं, झिझके नहीं और न ही डरे अपनी गवाही को साझा करें।
विशेष बात: हर स्थान हर समय किसी भी वक्त में किसी के साथ भी अपने अनुसार अपनी गवाही को ऐसे ही साझा न करें। हर स्थान फलवंत होने के लिए नहीं चुना जाता और हर बंजर जगह को परमेश्वर फलवंत नहीं बनाते। मैं जीवनों व हृदयों की बात कर रहा हूं। बाइबल बताती है शहर के बाहर जाकर अकेले में यीशु ने एक अंधे को आंखें दी और वह देखने लगा परंतु प्रभु यीशु उससे एक बात कहते हैं यह जो तेरे साथ हुआ है इसको किसी से न कहना। मतलब अपनी गवाही हर स्थान हर किसी के आगे मत देना।
वह इसलिए क्योंकि प्रभु यीशु मसीह वह प्रकाशन है जिसके द्वारा अंधकारमय जीवन प्रकाश में आ जाता है और बंजर जीवन फलवंत हो जाता है। और यीशु परमेश्वर के दिए वह वरदान है जो हर किसी के लिए नहीं है केवल उसी के लिए हैं जिनको परमेश्वर ने अनंत जीवन देने के लिए ठहराया है।
गवाही देने के लिए माहौल का भी आप ध्यान रखें क्योंकि हर माहौल गवाही देने के लिए नहीं होता जैसे जन्मदिन का समारोह या कोई विवाह समारोह। जगह व समय ऐसा हो जहां आप अपनी गवाही सुनाएं तो लोग सुनकर विश्वास में बढ़े। यह सबसे अच्छा है कि अपने पासबान से भी जरूर पूछें कि क्या हम यहां पर अपनी गवाही दे सकते हैं? तब वे आपका मार्गदर्शन करेंगे हां या न में। उनकी बात का बुरा न माने वह आपको सही बात बताएंगे। आपकी गवाही बहुमूल्य है। परमेश्वर आपके पास खुद लोग लेकर आएंगे। आप गवाही चर्च में दें जब पासवान गवाही का अनाउंसमेंट करें या समय दे तो उसमें आपका हाथ मेरा विश्वास है सबसे पहले उठेगा।
आप अपनी गवाही एक स्थान पर बार-बार न दोहराएं आपकी गवाही एक ही है पर लोग और जगह आपको परमेश्वर अलग-अलग जरूर देंगे। परमेश्वर आपको आशीष दे आमीन ✝️
Pastor Vivek Simon 🙏




Comments
Post a Comment